बिहार : चुनाव विश्लेषण

बिहार चुनाव प्रचार  धीरे धीरे अपनी रफ़्तार पकड़  रहा है , अभी चुनावी रंगमंच में प्रचार भावुकता   के इर्द गिर्द घूम रहा है , डीएनए ,थाली ,पैकेज सब कुछ है एक बड़े चुनावी समर में, सभी दल के  चाणक्य  अपनी- अपनी चुनावी रणनीति   बनाने में  व्यस्त हैं   अभी सीट बंटवारे की असली जदोजहद बाकी  है , और जब तक सीटों में उम्मीदवार घोषित न हो जाये मतदाताओ के मनोभाव को समझना काफी कठिन है|हमने विंभिन्न मुद्दों का विश्लेषण किया है जो कि बिहार चुनाव को काफी हद तक प्रभावित करेंगे ।

लालू  यादव का प्रभाव :  कितना महत्वपूर्ण है लालू  यादव  का बिहार चुनाव में समझने से पहले कुछ आकड़ों  विश्लेषण करना होगा , वर्ष २०१४ के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और राजद एक साथ चुनाव लड़े,कांग्रेस ने अपने लोकसभा क्षेत्रोँ के विधानसभा  क्षेत्रोँ में 28.33% वोट प्राप्त किया, इन्ही क्षेत्रोँ में 2010 के विधानसभा चुनाव में उन्हें 9.6% का वोट मिला था उस समय कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ी थीं। लालू के साथ ने कांग्रेस के वोट में 18.73% का इजाफा किया। नीतीश के साथ चुनावी  तालमेल के बाद लालू का जादू अपने परम्परागत समर्थकों में कितना बरक़रार रहेगा इसका आनेवाले विधानसभा चुनाव के परिणाम को काफी हद तक प्रभावित करेगा|

 

जीतन राम मांझी का प्रभाव : बिहार की राजनीति में विकास को मुद्दे के रूप में कितना भी उछाला जाये, उसका आखिरी सच तो जातीय समीकरण ही है. चुनाव के ठीक पहले जातीय ध्रुवीकरण अपने चरम पर हो जाता है. आम तौर पर जातीय समीकरण को समझना आसान है. लेकिन आने वाले चुनाव में इस समीकरण का स्वरुप काफी टेढ़ा होने वाला है. इस समीकरण को अपने  पक्ष में करने के चक्कर में नितीश कुमार ने जिस महादलित नामक नए जतिसमूह को खड़ा किया था, उनके लिए ही भस्मासुर की तरह हो गया है. लेकिन इसमें मांझी की कोई गलती नहीं है. जातीय राजनीति की यही नीयति है. जातियों के अन्दर भी जातियां हैं और उनके अन्दर नेतृत्व का उदय होना कोई अस्वाभाविक भी नहीं है. अब यह समझना महत्वपूर्ण है कि मांझी कहाँ-कहाँ प्रभावशाली हो सकते है. इसे केवल इस बात से नहीं  समझा जा सकता है कि किस विधान सभा में महादलित की संख्या कितनी है.  बल्कि समझना यह होगा कि वहां के जातीय समीकरण में महादलित प्रभावकारी हो पायेगा या नहीं. उदाहरण के लिए यदि किसी विधान सभा में महादलित की संख्या ज्यादा तो है लेकिन जातीय समीकरण में उसकी हिस्सेदारी अन्य के अपेक्षा कम है तो वहां उनका कोई खास प्रभाव नहीं पड़ेगा. इस गणित के हिसाब से लगभग 14 विधान सभा क्षेत्रों में मांझी निर्णायक रूप से अतिप्रभावकारी हो सकते हैं;  2 क्षेत्रों में प्रभावकारी  हो सकते है; 35 क्षेत्रों में उनका मध्यम प्रभाव रहेगा और बचे हुए क्षेत्रों में उनका कोई असर होने की संभावना नहीं है.

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महिला मतदाताओं का प्रभाव: नीतीश कुमार ने अपने पहले कार्यकाल में  एक नए तरह का राजनीतिक प्रयोग किया था, महिलाओं का सामाजिक- राजनीतिक और आर्थिक मॉडल , और इसका फायदा उन्हें मिला भी ,२०१० के विधानसभा चुनाव में दुबारा सत्ता वापसी महिला मतदाता के अपार समर्थन के बिना संभव नहीं था। बहुत सारी योजना महिलाओं के लिए शुरू की गयी , जैसे महिला आरक्षण लोकल  चुनाव में , प्राथमिक टीचर भर्ती में, पुलिस कांस्टेबल और सब -इंस्पेक्टर भर्ती में इत्यादि । संक्षिप्त में कहा जाय तो नीतीश के “गुड गवर्नेंस ” की कहानी में महिलाओं से मिले विशाल जन समर्थन एक महत्वपूर्ण किरदार है ,और इन सबके के पीछे महिलाओं के अंदर सुरक्षा की भावना थी।  जंगल राज और मिस-गवर्नेंस  कुछ ऐसे विषय है जिन्हे अप्राशांगिक नहीं किया जा सकता है।  बीजेपी भी जंगल राज के मुद्दे को जोर-शोर से उठा रही है, उन्हें पता है की आधी  आबादी का  समर्थन बहुत जरूरी है , पिछले हरियाणा और झारखण्ड के चुनाव में बीजेपी की जीत में महिलाओं के समर्थन का बहुत बड़ा हाथ  था।

 

पप्पू यादव का असर : पप्पू यादव का असर मधेपुरा , पूर्णिया  और सुपौल के 11 विधानसभा क्षेत्रों में रहेगा , और इतने महत्वपूर्ण चुनाव में ये 11 क्षेत्र काफी  निर्णायक भूमिका निभाएँगे।

 

मुस्लिम  मतदाता और ओवैसी फैक्टर : लालू , नीतीश और कांग्रेस सभी बिहार विधानसभा चुनाव में ओवैसी फैक्टर को नकार रहे है परन्तु मुस्लिम वोट को बिखरने न देने के लिए ऐड़ी चोटी का जोर भी लगा रहे है।  कुछ आंकड़े जानने जरूरी है ओवैसी फैक्टर को समझने के लिए , ११ विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी ४०% से अधिक है ,७ विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी ३० से ४० % के बीच में है , और २९ विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी 20 से ३० % के बीच है।  कुल ४७ विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम मतदाता एक निर्णायक भूमिका निभा सकते है। ओवैसी युवा मुस्लिम मतदाताओं में काफी पसंद किये जा रहे है , ये वो मतदाता है जिन्हे शिक्षा , रोजगार और विकास की उम्मीद ओवैसी में जायदा दिखलाई  देती है।

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युवा मतदाताओं का प्रभाव : पिछले लोकसभा चुनाव में युवाओं ने  NDA का  भरपूर साथ दिया था, मोदी की गया  और भागलपुर रैली के विश्लेषण से पता चलता है कि अभी भी मोदी का जादू युवा मतदाताओं पर बरक़रार है , ये जादू विधानसभा चुनाव तक कायम रहेगा या नहीं अभी कहना मुश्क़िल है परन्तु युवाओँ की भागीदारी चुनाव परिणाम को काफी प्रभावित करेगी।

 

छोटे राजनीतिक  दलों और स्वतंत्र  उम्मीदवारों का प्रभाव : पिछले विधानसभा  चुनाव मे जितने वाले उम्मीदवारों ने औसत  39.93% वोट प्राप्त  किया ,जबकि उप-विजेता उम्मीदवारों का औसत वोट प्रतिशत रहा 27.51% , लोकसभा 2014 मे 42.57% और 29.97% औसत वोट क्रमश: विजेता और उप-विजेता प्रत्यशी को मिले । आकड़ों  से स्पषट है कि विधानसभा चुनाव मे काफी नज़दीकी मामला  होता है, वैसे  मे वोट कटुवा उम्मीदवार को हलके मे नहीं लिया जा सकता है ।

पिछले विधानसभा  चुनाव मे 56 ऐसी विधानसभा सीट थी जहाँ 5% से भी कम मार्जिन मे जीत और हार का फैसला हुआ , इन 56 सीट  मे 25 सीट ऐसी  थी जहाँ  छोटे राजनीतिक दल  और स्वतंत्र  उम्मीद्वारों  ने 15.38% औसत वोट के साथ प्रथम तीन स्थान पे  बने रहे , इन 25 सीट मे 18 स्वतंत्र उम्मीद्वारों ने औसत 14.56% वोट प्राप्त किया  और 7 पर छोटे राजनीतिक दलों ने 17.19% औसत वोट प्राप्त किया|

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आकड़ो से  बहुत स्पषट है क़ि छोटे राजनीतिक दल  और स्वतंत्र  उम्मीदवार के द्वारा बहुत छोटा बदलाव भी  चुनाव परिणाम को बहुत प्रभावित  कर सकता है ।

 

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