मांझी और बिहार की राजनीति

बिहार की राजनीति में विकास को मुद्दे के रूप में कितना भी उछाला जाये, उसका आखिरी सच तो जातीय समीकरण ही है. चुनाव के ठीक पहले जातीय ध्रुवीकरण अपने चरम पर हो जाता है.आम तौर पर जातीय समीकरण को समझना आसान है. लेकिन आने वाले चुनाव में इसnसमीकरण का स्वरुप काफी टेढ़ा होने वाला है. इस समीकरण को अपने पक्ष में करने के चक्कर में नितीश कुमार ने जिस महादलित नामक नए जतिसमूह को खड़ा किया था, उनके लिए ही भस्मासुर की तरह हो गया है. लेकिन इसमें मांझी की कोई गलती नहीं है. जातीय राजनीति की यही नीयति है. जातियों के अन्दर भी जातियां हैं और उनके अन्दर नेतृत्व का उदय होना कोई अस्वाभाविक भी नहीं है. धीरे-धीरे यदि यादवों के उपजातियों में नेतृत्व की आकांक्षा हो सकती है, या कोयरी और कुर्मी अलग हो सकते हैं तो इसी तर्क से महादलित भी अपनी अलग राजनैतिक पहचान बनाने की कोशिश क्यों नहीं कर सकते हैं.मांझी भले ही कमजोर दीखते हैं, लेकिन जिस राजनीति की शुरुआत उन्होंने की है उससे सामजिक न्याय की राजनीति करने वालों को एक झटका लगा है. उनके ही तर्क पर मांझी की राजनीति की बुनियाद है इसलिए वे उसे झुठला भी नहीं सकते हैं. यही कारण है कि लालू यादव, मांझी को अपने साथ रखने का प्रयास करते रहे. लेकिन अब नितीश और लालू के गठबंधन से मांझी के पास भाजपा के अलावा कोई उपाय नहीं रहा. वैसे भी लोगों का मानना है कि शुरू से ही भाजपा मांझी को समर्थन दे रहा है. भाजपा के पास इस जातीय राजनीति का एक ही काट है कि जातियों के अंदर से उपजातियों को खडा कर अपने करीब लाये. क्योंकि बिहार में हिन्दू-मुसलामानों के बीच के सम्बन्ध ऐसे नहीं रहे हैं कि वहां धार्मिक ध्रुवीकरण बहुत आसान हो. जब सीमांचल में जहाँ मुसलमान जनसंख्याँ काफी ज्यादा है, पिछले चुनाव में काफी प्रयासों के बावजूद ऐसा नहीं हो पाया, तो अब उसकी संभावना बहुत कम है. इसलिए मांझी फैक्टर का भाजपा के लिए बहुत महत्त्व है. कुछ लोगों का मानना है कि मांझी का महादलितों पर कोई खास प्रभाव नहीं होगा क्योंकि इसके पहले अपनी राजनीति में उन्होंने महादलित के लिए कुछ भी नहीं किया है. कांग्रेस, राजद या जदयू के साथ रहकर मांझी ने कभी महादलित की बात नहीं की. अचानक मुख्यमंत्री बनते ही उन्हें उनकी याद आ गयी. लोगों का यह भी मानना है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद भी कोई कार्य उनका ऐसा नहीं था जो उन्हें महादलित या उनकी अपनी जाति का नेता सिद्ध कर सके। साथ ही आगे उनके द्वारा बनाए गए मोर्चे में एक भी महत्वपूर्ण महादलित चेहरा नहीं है। उनका साथ वही नेता दे रहे हैं जो नितीश से विछुब्ध हैं। इन नेताओ का बिहार के स्तर पर कोइ इमेज नहीं है। इस लिए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि महादलित के नेता के रूप में मांझी की पहचान मिडिया और बीजेपी ने बनाई है। शायद जमीनी हकीकत यह नहीं है, बल्कि महादलित भी यह मानते हैं कि मांझी को विछुब्ध नेताओ ने सेफ्टी वाल्व के रूप में उपयोग कर नितीश के ऊपर दबाव बनाने की कोशिश की जिसमे मांझी खेमा पूर्ण रूप से विफल रहा। इसलिए कुछ विश्लेषकों का यह मानना है कि मांझी का उपयोग राजनितिक कारणों से किया गया एवम् मांझी का प्रभाव महादलित नेता के रूप में उभरने की बात भ्रामक है। लेकिन, महत्वपूर्ण सवाल मांझी के भूत और वर्तमान काल का नहीं है, बल्कि महादलित राजनीति के भविष्य का है. बिहार के इतिहास में दलित मुख्यमंत्री पहले भी हुए, लेकिन स्वतंत्र दलित राजनीति की शुरुआत नहीं हो पाई. सवाल है क्या मांझी को इस राजनीति का जनक माना जाएगा. यदि ऐसा हो सकता है तो इसी तर्क पर यह संभावना भी कि जमीनी हकीकत अगले कुछ महीनों में बदलने लगे. बिहार महाराष्ट्र या उत्तरप्रदेश से अलग है. यहाँ जमीनी स्तर पर दलितों और महादलितों का टकराव ज्यादा पिछड़ों से है न कि ऊँची जातियों से. इसलिए भाजपा के साथ भी मांझी जाते हैं तो उनके लिए ख़ास संकट नहीं होगा. इस बात को मानना मुश्किल नहीं होना चाहिए क्योंकि हमारे पास रामविलास पासवान का उदाहरण मौजूद है. अब यह समझना महत्वपूर्ण है कि मांझी कहाँ-कहाँ प्रभावशाली हो सकते है. इसे केवल इस बात से नहीं समझा जा सकता है कि किस विधान सभा में महादलित की संख्या कितनी है. बल्कि समझना यह होगा कि वहां के जातीय समीकरण में महादलित प्रभावकारी हो पायेगा या नहीं. उदाहरण के लिए यदि किसी विधान सभा में महादलित की संख्या ज्यादा तो है लेकिन जातीय समीकरण में उसकी हिस्सेदारी अन्य पिछड़ी की अपेक्षा कम है तो वहां उनका कोई खास प्रभाव नहीं पड़ेगा. इस गणित के हिसाब से लगभग चौदह विधान सभा क्षेत्रों में मांझी निर्णायक रूप से अतिप्रभावकारी हो सकते हैं; तीन क्षेत्रों में प्रभावकारी हो सकते है; चौतीस क्षेत्रों में उनका कुछ-न-कुछ प्रभाव रहेगा और बचे हुए क्षेत्रों में उनका कोई असर होने की संभावना नहीं है. अब सवाल है कि भाजपा के अगड़ी और पिछडी जाति के लोग मांझी के इस प्रभाव को स्वीकार करउन्हें यथोचित सम्मान देते हैं या नहीं. सामान्यतया यह समझा जा रहा है कि रामविलास पासवान मांझी के साथ भाजपा के संबंधो को लेकर चिंतित हैं, लेकिन चुनावी गणित के हिसाब से ऐसा होने की संभावना कम है, क्योंकि मांझी के प्रभाव क्षेत्र और पासवान के प्रभाव क्षेत्र में बहुत समानता नहीं है. बल्कि उनके एक साथ होने से महागठबंधन के लिए संकट हो सकता है. यदि मांझी और पासवान एक साथ काम करें तो भाजपा में भी अगड़ी जाती के प्रभाव को कम किया जा सकता है. (लेख डाटामिनेरिया के शोध पर आधारित है)

 

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